दंडीस्वामी पूर्णानंद तीर्थ महाराज
दंडीस्वामी पूर्णानंद तीर्थ महाराज
स्पष्ट किया—दंडीस्वामी पूर्णानंद तीर्थ महाराज शंकराचार्य परंपरा के शिष्य थे। वे वेदांत अद्वैतवादी रहें। इसका अर्थ है, उनकी आध्यात्मिक वंशावली आदि शंकराचार्य से शुरू होती है और उसी गुरु-शिष्य परंपरा की कड़ी में सम्मिलित है।
दंडी संन्यासी वंशावली का स्वरूप
शंकराचार्य परंपरा में दंडी संन्यासी गुरु-शिष्य संबंध से बड़ा महत्व रखते हैं।
आदि शंकराचार्य से शुरू होकर, यह परंपरा विभिन्न पीठों—काशी, त्रिवेणी, हिमाचल आदि तक फैली है।
पूर्णानंद तीर्थ महाराज इसी महान शंकराचार्य-वेदांत परंपरा के ध्वजवाहक और दंडी संन्यासी समारोह में शामिल माने जाते हैं।
इसलिए, उनकी वंशावली:
आदि शंकराचार्य → पीठाधिपतिगण/गुरु परंपरा → पूर्णानंद तीर्थ महाराज
यह परंपरा उनके आध्यात्मिक गुरु, पीठ और आश्रम अभिलेखों के अनुसार विस्तृत रूप में प्रस्तुत की जा सकती है, और इनका मुख्य आधार शंकराचार्य परंपरा में ही है।
दंडी स्वामी और दंडी संन्यासी दोनों के बीच क्या अंतर हैं!
दंडी स्वामी और दंडी संन्यासी दोनों ही हिंदू धर्म की संन्यास परंपरा से जुड़े हैं, और ये दोनों ही 'दंड' (छड़ी) धारण करते हैं. हालांकि, उनके बीच कुछ सूक्ष्म अंतर हैं:
दंडी संन्यासी
अर्थ: 'दंडी' शब्द का अर्थ है 'दंड धारण करने वाला', और 'संन्यासी' का अर्थ है 'त्याग करने वाला'.
पहचान: दंडी संन्यासी वे होते हैं जो वैदिक परंपरा और सनातन धर्म के अनुसार अद्वैत वेदांत के अनुयायी होते हैं.
परंपरा: ये मुख्य रूप से आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित दशनामी परंपरा के अंतर्गत आते हैं.
जीवन: इनका जीवन ब्रह्मचर्य, निरामिष भोजन और अध्यात्म में समर्पित होता है. ये संसार के सभी सांसारिक बंधनों और सुखों का त्याग कर देते हैं.
योग्यता: दंडी संन्यासी केवल ब्राह्मण ही हो सकते हैं.
दंडी स्वामी
अर्थ: 'स्वामी' शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक शिक्षक या गुरु के लिए किया जाता है.
पहचान: दंडी स्वामी वे संन्यासी होते हैं जो हमेशा दंड लेकर पैदल चलते या यात्रा करते रहते हैं.
योग्यता: दंडी स्वामी बनने के लिए 12 वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना और गृह त्याग जैसे कठोर नियमों का पालन करना होता है.
मृत्यु के बाद: दंडी स्वामी को मृत्यु के बाद समाधि दी जाती है, उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाता. मान्यता है कि उनकी साधना का चक्र पूरा करने के लिए उनके शव को पवित्र नदी में प्रवाहित किया जाता है.
संक्षेप में, दंडी संन्यासी एक व्यापक पद है जो दंड धारण करने वाले संन्यासियों को संदर्भित करता है, जबकि दंडी स्वामी एक विशिष्ट पद है जो ऐसे संन्यासियों को दिया जाता है जो आध्यात्मिक गुरु या शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं और कठोर नियमों का पालन करते हैं.
साझा की गई इस छवि में दंडीस्वामी पूर्णानंद तीर्थ महाराज को दंड (छड़ी) के साथ ध्यानमग्न मुद्रा में दर्शाया गया है।
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क्षेत्रीय आश्रम और संत परंपरा
दंडीस्वामी पूर्णानंद तीर्थ महाराज शारदा मठ (द्वारका, गुजरात), श्रृंखला मठ (श्रृंगेरी, कर्नाटक), त्रिवेणी (हुगली जिला, पश्चिम बंगाल), काशी (उत्तर प्रदेश) और हिमाचल प्रदेश, इन पांच क्षेत्रीय संत परंपराओं या आश्रमों से जुड़े हुए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनका संतत्व बहु-क्षेत्रीय और भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों (द्वारका, श्रृंगेरी, काशी, त्रिवेणी, हिमाचल) तक विस्तार हुआ था।
क्या श्रृंखला मठ (श्रृंगेरी) और शारदा मठ (द्वारका) एक ही नहीं हैं !
५०, ६० या ७० के दशक में ऐसा नहीं था। उस समय स्वाधीनता के बाद सारे देश को संभालने, जनमानस में धर्म की प्रति सहनशीलता और आदर के लिए कर्म कर रहे थे। तो गुरुजी कभी श्रृंगेरी जाते, कभी द्वारका जाते। कुंभ, महाकुंभ जाते थे। अंततः वो शारदा मठ से रहे थे। हमें शारदा मठ से हैं यही पता।
श्रृंखला मठ (शृंगेरी शारदा पीठम) दक्षिण भारत के कर्नाटक में स्थित है। यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों में से एक है, जो अद्वैत वेदांत परंपरा का प्रचार करता है। इसे दक्षिणाम्नाय शारदा पीठम के नाम से भी जाना जाता है। यह मठ देवी शारदा की उपस्थिति और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध है।
शारदा मठ (द्वारका शारदा पीठम) गुजरात के द्वारका में स्थित है। इसे पश्चिमाम्नाय श्री शारदा पीठम भी कहा जाता है और यह भी आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों में से एक है। यह मठ वेदांत दर्शन और साम वेद के अध्ययन हेतु प्रमुख है। इसे पश्चिमी चार धाम में गिना जाता है।
शारदा पीठ - महाशक्ति पीठ, देवी शारदा (सरस्वती)
शारदा पीठ पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर के नीलम घाटी में स्थित एक प्राचीन हिंदू मंदिर और शिक्षा केंद्र है। यह ऐतिहासिक रूप से वैदिक विद्वत्ता का एक प्रमुख केन्द्र था और भारतीय उपमहाद्वीप के प्रारंभिक प्रसिद्ध मंदिर-विश्वविद्यालयों में से एक था (6वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक)।
यह एक महाशक्ति पीठ है, जो देवी शारदा (सरस्वती) को समर्पित है, और विशेष रूप से कश्मीरी पंडितों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है।
भुजाओं के परंपरागत चिन्ह
फोटो में दंडीस्वामी पूर्णानंद तीर्थ महाराज के दोनों भुजाओं (बाहों) पर जो निशान दिखाई दे रहे हैं, वे पारंपरिक वैष्णव या दंडी संन्यासी चिह्न हो सकते हैं, जिन्हें संस्कृत में 'तिलक चिन्ह', 'उर्ध्वपुंड्र', या 'संस्कार चिन्ह' भी कहते हैं। ऐसे चिन्ह आमतौर पर दीक्षा के समय गुरु द्वारा शिष्यों को धारण कराए जाते हैं और उनका संबंध वैष्णव, वेदान्त या संन्यास परंपरा के आध्यात्मिक अनुशासन से होता है।
विशेषता:
वे प्रतिदिन अपने गुरुजी को भोग अर्पित करते थे और उसके पश्चात स्वयं अपने शिष्य के साथ प्रसाद ग्रहण करते थे। यदि कोई शुद्ध और सत्यनिष्ठ होकर भोजन तैयार करता था, तभी वे उस सेवा को स्वीकार करते थे। वे कभी कभी भाव में होते थे। बड़े बड़े आंखों से हमें देखते थे। कोई भी पूजा नियम में पारंगत थे। बहत अनुरोध पर वे पूजा करते थे।
सत्तर के दशक में शायद 1966 अक्टूबर में एकबार उन्होंने दुर्गा पूजा किया था। लामडिंग के बोस बस्ती एक इलाका है, वहां पर। बोस बाबू शायद उनका नाम राखाल बोस। वे कॉन्ट्रैक्टर के साथ मुहरी का काम करते थे। आजकल इसे साईट बाबू बोलते हैं। उनके प्रार्थना स्वीकारते हुए महाराज ने दुर्गा पूजा की थी। ये ७० की दशक के बात हैं।
बाएँ ओर से, हरिदास राय (प्रधान शिष्यों में से एक), दंडीस्वामी पूर्णानंद तीर्थ महाराज, सुप्रभा देवी (राय, हरिदास राय की धर्मपत्नी), बोसबाबू।🙏
वे मेरे मा बाबूजी के गुरु हैं और मेरे मातृकुल से हमारे घर आए थे। गुरुजी अक्सर "तत्वमसि", "शारदा", "कालिका" नाम बोलते थे। जब हम तीन चार साल के छोटे बच्चे गलती से "कालिके" बोलते, तो वे बंगला भाषा में सही उच्चारण "कालिके नहीं कालिका बोल" ऐसे सिखाते थे।
वे 'दशनामी' में से 'तीर्थ' थे। हमलोग बंदोपाध्याय, बैनर्जी यानी सामवेद के है। तो एकबार वे हमारे सामने आलोचना की हमारा भी सामवेद और अपलोग भी सामवेद। हमारे घर में आके वे संतुष्ट प्रतीत होता था। उस समय हमारे दिन भी अच्छे जा रहे थे।
ब्रिटानिका के अनुसार, दशनामी संन्यासी आमतौर पर गेरुए रंग के वस्त्र पहनते हैं और यदि उन्हें मिल जाए तो अपने कंधे पर बिछाने के लिए बाघ या तेंदुए की खाल रखते हैं। वे अपने माथे और शरीर के अन्य हिस्सों पर श्मशान की भस्म से बनी तीन क्षैतिज पट्टियों (तिलक) का चिह्न लगाते हैं, और 108 रूद्राक्ष के बीजों की माला पहनते हैं। ये अपनी दाढ़ी बढ़ने देते हैं और अपने बाल कभी खुले रखते हैं तो कभी जूड़ा बाँधते हैं।"
"मैंने भी उन्हें (महाराज को) कभी जूड़े में और कभी खुले बालों में देखा है।"
तिलक के बारे में एकबार मैने बोला दादू हमें वो फोटा (बंगला) तिलक दो। तभी वो बोले नहीं बाबा ये हमें लगाना पड़ता हैं, इसमें शमशान के राख होते हैं, आपको नहीं दे सकते। वे सरल प्रकृति के साधारण भाव से बाते करते थे।
हमलोग तीन चार साल का छोटा बच्चा, उनको दादू यानी नानाजी बोलते थे, वे बड़े मजे लेते थे और फूल फूल कर हंसते थे। वे रुद्राक्ष, रक्तांबर, और उससे थोड़ी फीकी धोती पहनते थे। बंगाली बहत अच्छे बोलते थे। हो सकता हैं कि वे बंगाल से हो।
दशनामी संप्रदाय में "तीर्थ"
दशनामी संप्रदाय में "तीर्थ" नाम वाले सन्यासियों के बारे में पारंपरिक विवरण यह है कि तीर्थ, आश्रम, सरस्वती और भारती — इन चार उपनामों (नामों) में से आधे अर्थात् साढ़े तीन (3.5) “दंडी” माने जाते हैं, बाकी छह ‘गोस्वामी’ या ‘गोसाई’ (गैर-दंडी) कहलाते हैं। यानी "तीर्थ" वाले दशनामी परंपरा में मुख्यत: दंडी सन्यासी होते हैं, और परंपरा के अनुसार साढ़े तीन नाम (तीर्थ, आश्रम, सरस्वती, भारती का भाग) ही दंडी होते हैं, बाकी नहीं।
प्रमुख तथ्य
तीर्थ, आश्रम, सरस्वती और भारती —ं इनमें से साधारणत: "दंडी" सन्यासी होते हैं।
परंपरागत मठों और अखाड़ों में ‘दंडी’ का मतलब है कि वे एक ‘दंड’ (लकड़ी की छड़ी/छत्र) धारण करते हैं, जो सन्यास की विशिष्ट पहचान है।
शेष छह नामों (गिरि, पुरी, वन, अरण्य, सागर, पर्वत) को सामान्यतः 'गोसाई' या नागा कहा जाता है — वे दंडी नहीं होते।
इस प्रकार, "तीर्थ" नाम के दशनामी संन्यासी 'दंडी' होते हैं, और कुल ‘दंडी’ शाखाएं 3.5 मानी गई हैं।
सामान्यतः मठ के अनुसार दंडी कैसे होते है, उपास्य देवता कौन होते है, इत्यादि!
व्रतबंध और दीक्षा के निशान
अगर भुजा पर गोल या रेखीय, फफोले जैसे या गनगन पट्टियों वाले दाग हैं, तो वे 'व्रतबंध' (संन्यास दीक्षा या अनुष्ठान के समय लोहे के जलते छल्ले से दागने की प्रथा) के भी हो सकते हैं, जो परंपरागत अनुशासन, त्याग और दीक्षा की गहनता
दर्शाते हैं। विशेषकर असम, बंगाल, और पूर्वोत्तर भारत की कुछ संन्यासी या साधुओं की परंपरा में व्रतबंध या ऐसे चिह्नों की प्रथा रही है – यह दीक्षा या त्याग का प्रतीक माना जाता है।
समाधि स्थल और जीवन-यात्रा
महाराज जी की देहरखा (मृत्यु) 1981 में असम के गोलाघाट जिले के बोरपाथर रेलवे स्टेशन के करीब सिंगिमारी टी एस्टेट में हुई और वहीं समाधि बनी है – वे कोलकाता, बनारस, प्रयाग, लक्ष्मणझूला, चंबा, ज्वालामुखी, धर्मशाला, ऋषिकेश, हर की पौड़ी (वे हरद्वार को इसी नाम से बोलते थे), श्रृंगेरी, अलीपुरद्वार, बोंगाईगांव, गुवाहाटी, लामडिंग, स्वरूपाथर, बोरपाथर तथा अरुणाचल प्रदेश के तवांग, परशुरामकुंड, इत्यादि स्थान में पदब्रज और रेलवे से यात्रा करे है। इनका सम्बन्ध पुष्कर तीर्थ तथा वहां के सरस्वती मंदिर व आश्रम से रहे। स्थानीय संत-परंपरा, भक्त समुदाय और क्षेत्रीय धार्मिक संस्कृति का गवाह है। ऐसे संतों की स्मृति स्थल (समाधि) अनुयायियों और श्रृद्धालुओं के लिए तप, भक्ति और परंपरा का महत्त्वपूर्ण केंद्र होती है।
सिंगिमारी टी एस्टेट: (विकिपीडिया लिंक बरपाथर के एग्रीकल्चर सेक्शन से पुष्टि करें)
बरपाथर में कई चाय बागान हैं, जैसे पभाजन टी एस्टेट, बारपाथर टी एस्टेट, भुयान बागान, दिघाली टी एस्टेट, रेंगमाई टी एस्टेट, सिंगिमारी टी एस्टेट आदि।
सतर्कीकरण: इस जग में समय के साथ बहत कुछ मिट जाती हैं। किसके पास उनके बारे में सही जानकारी हो तो कृपया कमेंट करें ।
निवेदन: दूसरे एक कोई आए थे असम में पर वो ढोंगी इनके नाम चुरा के आए थे, जिनको लोगो ने नहीं माने। यह लेख फोटो के साथ इसलिए छापे गए कि समय के साथ साथ इनके शिष्य संख्या कम हो रही है और त्रिवेणी, हुगली जिला, पश्चिम बंगाल से कोई स्पष्टीकरण नहीं पाए गए। इनके फोटो स्टूडियो लाइट एंड शेड, त्रिवेणी के साथ शेयर किए गए।




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